साँप

काँच पर रेंगते
साँप की तरह
मैंने
लाख कोशिशें कीं.
लेकिन
एक पग न बढ़ सका.

अच्छा होता
अगर
मैं
तपती रेत पर
नंगे पाँव चलता
कम-से-कम
आगे तो बढ़ता.

पाँव के छालों से
रिसते दर्द के अहसास को
भुला देता
बढ़ने की चाह में.
लेकिन नहीं
लाख कोशिशों के बावजूद़
मैं
वहीं खड़ा हूँ
जहाँ से बढ़ना आरम्भ किया था.

फिर भी
आशा के धरातल पर टिका
मेरा मन कहता है
मैं लड़ूँगा/बढ़ूँगा
जीत मेरी ही होगी
एक न एक दिन.

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