मैं एक पैरासाइट

मैं एक पैरासाइट
संपूर्ण पराश्रित
जीवन से मृत्यु तक
आदि से अंत तक.

असंख्य जीवों के
अहसानों तले दबा
निरीह
असहाय.

कितना खोखला हो गया हूँ
जिंदगी को ढोते-ढोते
ढोल की तरह
चीख सकता हूँ
चिल्ला सकता हूँ
पर कुछ कर नहीं सकता.
करूँ भी तो क्या ?
जो भी हैं
सब मेरे जैसे
एक दूसरे पर आश्रित.

जड़ें काटना मुझे नहीं आता
क्यों कि मैं स्वयं जड़हीन हूँ.

भौतिकता में लिप्त
पाश्चात्य-सभ्यता का गुलाम बन
टूटता जा रहा हूँ
दिन-प्रतिदिन.

इसीलिये अब
पानी और प्रकाश जैसी
मामूली व्यवस्था के
अव्यवस्थित हो जाने पर
परेशान हो उठता हूँ.

क्यों कि/मैं
एक पैरासाइट
संपूर्ण पराश्रित.

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