महाभ्रम

एक

हे प्रभू
मैं चाहता हूँ
मेरे इस जीवन के कारण
किसी को कष्ट न हो.

लेकिन बिना कष्ट के
जीवन जीना भी तो
संभव नहीं.

कहीं ऐसा तो नहीं
जीवन ही कष्ट का पर्याय हो ?

क्यों कि
जीवन का प्रारंभ ही
कष्ट से होता है.
जीवन के बीजारोपण से
अंकुरण तक माँ को
तत्पश्चात्
जगत में प्रवेशोपरांत से
इतिश्री तक
पंचतत्वों को.

लेकिन मैं सही हूँ
कैसे कहूँ
ये सब मेरा
भ्रम भी हो सकता है.

दो

पंचतत्वों से निर्मित
ढांचे में स्थित
जीवन द्वारा
पंचतत्वों को कष्ट देना
भला कष्ट कैसे हो सकता है
वल्कि इनको तो इस जीवन का
आभारी होना चाहिए
जो इन पंचतत्वों को आपस में
एकत्रित रखता है
पंचतत्वी ढांचे का
पोषण करता है.
जीवन तो मेहमान है
आता है
चला जाता है
इन सबके अस्तित्व का
बोध करा जाता है.

फिर तो जीवन द्वारा
किसी को भी कष्ट देने की बात
सोचना ही निरर्थक है.

ये शायद मेरा भ्रम है
ये शायद मेरा भ्रम ही है.

महाभ्रम !

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