मजबूरी

मैंने
तूने
इसने
उसने
सबने देखा था
वह दृश्य.

उसकी चीख भी सुनी थी
जो हमारे हृदयों को
बेध गई थी.
मगर….

मगर हम किसी शिल्पकार की
सुन्दर प्रतिमा की तरह
खामोशी के साथ
वह दृश्य देखते रहे थे.

हमारी अंतर्आत्मा हमें
कचोट रही थी
अंतर्मन हाहाकार कर रहा था
मगर…..
मगर हम दौनों से
विद्रोह करते हुये
खामोश खड़े थे.

इतना ही नहीं
जब हमसे अदालत में पूछा गया-
”क्या देखा ?”
तो हमने गीता पर हाथ रखकर
कुछ न देखने की
सौगंध भी खाई थी.

हम सब मुकर गये थे
अनजान बन गये थे.

कैसे कहते
कि हम
उनके अधीन हैं
और रात को दिन
दिन को रात कहने के लिये
मजबूर हैं.

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