दोस्त

तुम कहते हो तो
माने लेता हूँ
मुझे भूख नहीं है
क्यों कि
मैंने वचन दिया है तुम्हें
तुम्हारी हर बात मान लेने का.

मगर दोस्त
इस तरह मैं कब तक
तुम्हारी जायज़-नाजायज़ बातें
मानता रहूँगा.
तुम्हें
झूठा विश्वास दिलाता रहूँगा
कि मुझे भूख नहीं है
क्यों कि
भूख तो भूख होती है.
तुम अपनी ज़िद
छोड़ क्यों नहीं देते
तुम अपनी कसम
तोड़ क्यों नहीं देते.

आओ हम भी औरों की तरह
आज में जियें
समय के ज़ख्मों को
वर्तमान के धागे से सियें.

और
सत्य की हत्या कर
ईमानदारी का गला घोंट
निकल चलें
किसी ऐसी जगह
जहाँ हमें पहचानने वाला
कोई न हो.

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