डिग्री
चिमनियों से
उगलते धुएं की तरह
विश्व-विद्यालय
उगलते हैं
छात्र
डिग्रियों के साथ.
डिग्रियाँ
जिनका भविष्य होता है
सुनहरा/अंधकारमय.
छात्र डिग्रियाँ लिए
घूमता है
भटकता है
नौकरी की तलाश में
ऑफिस-दर-ऑफिस.
‘डिग्री’
जो कि नपुंसक है
पौरुषहीन है
यथार्थ से परे
जो केवल
स्वप्न दिखाना जानती है
”दिवा-स्वप्न.”