ज्वाला

क्या कहा !
सच कहना छोड़ दूँ
जो हो रहा है
होने दूँ
देखता रहूँ / कुछ न कहूँ.

लेकिन क्यों ?

तुम्हारा तात्पर्य क्या है
मानवीय क्षमताओं पर
रोक लगाने से.

मैं कोई पत्थर नहीं
जो जुल्मों को सहता रहूँ
जहाँ फैंको फिक जाऊँ
कुछ न कहूँ.

मुझमें सामर्थ्य है
विरोध करने की
करूँगा/चुप कैसे रहूँगा.
इससे तो अच्छा है
तुम ही अपने इरादे
बदल डालो.
इस तरह कब तक
दमन नीति का सहारा लोगे
भूख मिटाने का आश्वासन दोगे ?
ये तो ज्वाला है
जो दबाने से भड़कती है
बुझाने से सुलगती है.
कहीं ऐसा न हो
भड़क जाये
और तुम्हारी सारी क्षमताओं को-
जलाकर राख कर दे.

Leave a Reply

You must be logged in to post a comment.