चेतना
तुम्हें कुछ नहीं कहना
न कहो
लेकिन खामोश तो न रहो.
तुम्हारी ये खामोशी ही
ले डूबेगी/एक दिन तुम्हें
इस समय के बहाव में.
क्यों डरते हो
मेरे साथ/कदम मिलाकर चलने से ?
क्यों डरते हो
मेरी आवाज में
अपनी आवाज मिलाने से ?
मैं भी
तुम्हारी ही तरह
एक इंसान हूँ.
इस तरह जिंदा लाश बनकर
जीने से क्या फायदा ?
इसीलिये कहता हूँ
मत जमने दो
अपनी रगों में बहते
गर्म खून को.
इसे उबाल लेने दो
उफनने दो
तभी ये खामोशी/परिवर्तित होगी
चीख में
जो दहला आसमान को
चीर देगी पृथ्वी का सीना.
तभी
ये प्रकृति समझ पायेगी
कि हम कमजोर नहीं
वातावरण से विद्रोह लेने
समय को पछाड़ने की क्षमता
हम में भी है.