कहीं कुछ नहीं काँपता

एक पृथ्वी
अनेक देश/पहाड़/समुद्र/नदियाँ
एक भारत
अनेक प्रदेश
मध्यप्रदेश/राजस्थान/कश्मीर
एक कश्मीर
अनेक हत्यायें
आदमियों की/औरतों की/बच्चों की
लेकिन आश्चर्य
कहीं कुछ नहीं काँपता…..
कश्मीर से कन्याकुमारी तक
सब खामोशी के साथ
तमाशाई बने
रेडियो पर सुनते हैं
समाचार पत्रों में पढ़ते हैं
दूरदर्शन पर देखते हैं

और फिर भी
अपने त्यौहारों को
उत्सवों को
धूमधाम से मनाते हैं.
हँसते हैं
गाते हैं.

ओ मेरे देश के कर्णधारो
कुछ करो
इस अनवरत हत्याओं के दौर को
रोकने का हल खोजो

कहीं ऐसा न हो
देश के नक्शे में एक हिस्सा
लाशों से पट जाए
और आने वाली पीढ़ी
भारतवासियों को
मानवताहीन/संवेदन-शून्य समझकर
उनके प्रति घृणा से भर जाए.

ओ मेरे मालिको
कश्मीर को
हिरोशिमा-नागासाकी
बनने से रोको.
अपने शरीर के एक हिस्से को
गलने से रोको.
इससे पहले कि
वहाँ की मिट्टी में
परमाणु विस्फोट हो
कुछ करो.

ओ मेरे देश के कर्णधारो
मालिको
हल खोजो।
हल खोजो।।

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