कठपुतली

कभी-कभी लगता है
मैं बहुत थक चुका हूँ.
मेरा हर अंग
गल चुका है.
मेरा सारा खून/पानी बनकर
उन गले हुए अंगों से
बाहर टपक रहा है.

क्या ये सब
तुमने महसूसा ?

नहीं.
तो महसूसोगे
जब तुम्हारे होंठ
सीं दिये जायेंगे/कानून की
सूई से
चीखना चाहोगे/तब भी
चीख न सकोगे
कांटे बिछा दिये जायेंगे
तुम्हारी राहों पर
चलना चाहोगे/तब भी
चल न सकोगे.

मैं कह रहा हूँ
वह सत्य है
ये तुम/आज नहीं तो
हमेशा की तरह/कल
स्वीकारोगे.

क्योंकि स्वीकारोक्ति देना
तुम्हारी नियति बन चुका है.
तुम्हारा आत्म-विश्वास
मर चुका है
तुम विद्रोह करने की शक्ति
खो चुके हो
तुम चाहते हो जीना
सहनशील बनकर
लेकिन ये सहन-शीलता ही
तुम्हारी कमजोरी है
कायरता है
जो बोध कराती है
कि तुम
मात्र एक
ज़िन्दा कठपुतली की ज़िन्दगी
जीना पसंद करते हो
जो सिर्फ
इशारों की भाषा
समझती है.

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